रिम~झिम गिरे सावन मै १९६०, १९७० और कुछ हद तक १९८०-९० के हिंदी फिल्मी गानों का कई वर्षों से बड़ा प्रशंसक रहा हूँ। अभी भी रोज़ सुबह~शाम, काम पर जाते और वापस आते हुए, मैं इन्हीं दशकों के गानों को सुनते हुए, मुंबई की कठिन यातायात परिस्थितियों को अपनें लिए सुगम बनाने प्रयास करता हूँ। हाल के कुछ महीनों में, मेरे साथ सफर करने वाले, मिलेनियल (आज की नयी पीढ़ी के) सहकर्मियों में हिंदी फ़िल्मी संगीत के इस स्वर्णिम काल की जानकारी का आभाव, कवी के लिखे अप्रतिम शब्दों को समझने में होने वाली उनकी उलझन और उन्हें इस काल के गीतों को समझानें के मेरे प्रयासों का परिणाम है की आज मैं ये लेख लिखने की लिए प्रेरित हुआ हूँ । इस लेख को समीक्षा कहना उचित नहीं होगा, क्यूँ की, यह तो एक प्रशंसक के द्वारा की गयी विवेचना है, जो पिछले कई दिनों से इस गीत के बोल, संगीत, कलाकारों के अभिनय, दिग्दर्शक के अप्रतीम कार्य और गीत की सरलता से प्रभावित होकर लिखी गयी है। रिम~झिम गिरे सावन , वर्ष ...