थका हू़ँ, रुका हूँ , कई बार गिरा हूँ। सच कहूँ तो जीव़न में, बार-बार डरा हूँ। जतन से अौर अात्म संबल से, परिश्रम से और इच्छाशक्ती से, अपनों से की अभिव्यक्ती से, मै पुन: आगे बढ़ा हूँ। भाग्यरेखा से सामंजस्य, परिस्थितीयों से संघर्ष. थमा अवश्य हूँ कुछ क्षणों के लिये, पराजित निश्चित ही नहीं हुआ हूँ। अमोल