साल १९९४~९५ की बात होगी, आजोबा के घुटनों में काफ़ी तकलीफ़ थी। साधारण चलने फ़िरनें में भी उन्हें दर्द होनें लगा था। हम सभी के काफ़ी मनाने के बाद भी वे किसी अस्पताल में डॉक्टर को दिखानें में ना-नुकर कर रहे थे। काफ़ी मिन्नतों के बाद वे मेरे साथ गीताभवन अस्पताल जानें को तैय्यार हुए।
अस्पताल में डॉक्टर नें x~ray देखते ही बोला "बाबुजी ये गठिया (Arthritis) है। आपको घुटनों में बहुत दर्द होगा, कुछ समय में पैर थोड़े मुड़ने (bend) लगेंगे और चलने में दिक्कत होगी। इसका कोई इलाज नही हो सकता। आपको कुछ चीज़ों का ध्यान रखना होगा। ज़मीन पर ना बैठें, चाहें तो हाथ़ में सहारे के लिये काठी ले लें, पैरों पर ज्यादा ज़ोर आए, ऐसे व्यायाम ना करें।
डॉक्टर को यह सलाह देते हुए सुनकर मैं मन ही मन हँस रहा था। अजोबा, और आराम? ये सब वो कभी नहीं करने वाले। पर फ़िर सोचा , उनका दर्द इतना है कि ना चाहते हुए भी उन्हें ये सब करना ही पड़ेगा।
अजोबा राष्ट्रीय स्वयम् सेव़क संघ (संघ) के उन कर्मठ और अनुशासित कार्य़कर्ताओं में से थे जिन्हें आपतकाल (Emergency) के समय की १९ महीनों की जेल भी अपनें नियम और दिनचर्या बदलनें पर बाध्य नहिं कर सकी थी।
६०~६५ की आयु में भी प्रात:काल में ५ बजे उठना, अपनें नित्यकर्म समाप्त करके आजी के लिये चाय बनाकर उन्हें उठाना, साथ चाय पीकर टहलनें जाना, वहाँ साकेत नगर के उद्यान में संघ की शाखा में जाना, अपनें सारे व्यायाम पूर्ण करना। सायंकाल में घर के पेड़, पौधों, गमलों और क्यारीयों में काम करना आदी उनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग थे।
६०~६५ की आयु में भी प्रात:काल में ५ बजे उठना, अपनें नित्यकर्म समाप्त करके आजी के लिये चाय बनाकर उन्हें उठाना, साथ चाय पीकर टहलनें जाना, वहाँ साकेत नगर के उद्यान में संघ की शाखा में जाना, अपनें सारे व्यायाम पूर्ण करना। सायंकाल में घर के पेड़, पौधों, गमलों और क्यारीयों में काम करना आदी उनकी दिनचर्या का अभिन्न अंग थे।
डॉक्टर के यहाँ से वापस आते समय, मैं यह जाननें के लिये उत्सुक था की अब वे अपनी जीव़नचर्या में क्या बदलाव लाऐंगे। उनका इस तकलीफ़, बीमारी और उस कारण से आनें वाले शारीरिक परिवर्तन के बारे में क्या द्रुष्टीकोंण है और वे इन सभी बाधाओं और बंधनों से कैसे पार पाएेंगे। क्या वे अपनें रोजमर्रा के कार्यों को वैसे ही करतें रहेंगे? करना चाहें भी तो क्या वे कर पाएँगे? ऐसे कई सवाल मन में अाते रहे और घर पहुँचते~पहुँचते मैंने उन पर इन सभी प्रश्नों की झड़ी लगा दी। पर जैसे की आजोबा का स्वभाव था, उनका जवाब भी वैसा ही सरल था। "ह$$$म$$$ किती प्रश्न ते, घरी चल गपचुप" (कितनें सवाल करते हो, चुपचाप घर चलो)।
डॉक्टर के यहाँ से अानें के बाद उसकी सलाह की बात आई गई हो गई। आजोबा की अपनी दिनचर्या वैसी ही चलती रही। उनकी शारिरीक तकलीफ़, सिर्फ़ उनके चेहरे के हाव~भाव में दिखती थी. और वो भी तब, जब उन्हें पता ना हो कि आप उनकी और देख रहें हैं (उनकी नज़र भी क्षीण थी)।
कई साल बीत गये। वर्ष २००३~०४ की बात होगी। एक दिन सुबह-सुबह मैंने आजोबा को तकलीफ़ में सीढ़ीयों से उतरते देखा। वे सुबह शाखा जानें के लिये नीचे उतर रहे थे। मैनें कहा "आजोबा, इतनी तकलीफ़ है तो मत जाईये ना, आराम कीजिये घर पर"। कुछ क्षण रुक कर वे बोले "शरीर तकलीफ़ देकर अपना काम कर रहा है, तो मैं अपना काम कैसे ना करुँ। बीमार शरीर का काम है तकलीफ़ देना और मेरा काम उस तकलीफ़ पर ध्यान न देकर अपना काम करते रहना".
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| 'आजोबा', प्रबल इछाशक्ति के प्रेरणा स्त्रोत |
अपने आप को अपने शरीर से अलग करके देख़ने का यह एक अलग ही दृश्टिकोण था, आप अपने मन और विचारों को शरीर से अलग कर दें तो कष्ट और पीड़ा आपको नहीं हरा सकती। किंबहुना मन की इसी शक्ति को 'इच्छाशक्ति' कहतें हैं.
वैसे कहनें में जितना आसान लगता है करना उतना ही कठिन है. अपनें आप को कष्टों से अलग कोई कैसे करे ? पर मुझे लगता है अगर आप अपनें मन को इस तरह ढ़ालने का लगतार प्रयास करते रहें तो यह संभव है.
इसी इच्छाशक्ति के बल पर आजोबा नें अपने जीवन में किसी कष्ट, पीड़ा और विपरीत परिस्थितियों को अपनें ऊपर विजय नहीं पानें दिया।अपनें अंतिम समय तक वे अपने करीब करीब सारे कार्य लगभग उसी तरह करते रहे जैसे वे अपनी आयु के पूर्ववर्षों में करते थे.
वैसे कहनें में जितना आसान लगता है करना उतना ही कठिन है. अपनें आप को कष्टों से अलग कोई कैसे करे ? पर मुझे लगता है अगर आप अपनें मन को इस तरह ढ़ालने का लगतार प्रयास करते रहें तो यह संभव है.
इसी इच्छाशक्ति के बल पर आजोबा नें अपने जीवन में किसी कष्ट, पीड़ा और विपरीत परिस्थितियों को अपनें ऊपर विजय नहीं पानें दिया।अपनें अंतिम समय तक वे अपने करीब करीब सारे कार्य लगभग उसी तरह करते रहे जैसे वे अपनी आयु के पूर्ववर्षों में करते थे.
अटल/प्रबल इच्छाशक्ति, व्यक्ति को कई दुखों, कष्टों और विपरीत परिस्थितियों से लड़नें और पार पानें में सहायक होती है। पिछले ५ वर्षों में उनकी इसी क्षमता को अपनी क्षमता बनाने के प्रयास में कई बड़ी बाधाओं और कष्टों को पार करने और उनपर विजय पानें का बल मिला है और आगे भी मिलता रहेगा यह विष्वास है.

बहुत अच्छा लिखा है अमोल। पुरानी यादें ताज़ा हो गईं।उस समय हम सब कम्युनिटी हाल मे खेला करते थे जब उनके घूमने का समय हुआ करता था।वो सच मे प्रेरणा के स्तोत्र थे। शांत परंतु अत्यंत अनुशासित। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। ॐ!
ReplyDeleteबहुत ही बढीया। साधे और अनुशासित जीवन का एक अतुलनीय उधाहरण।
ReplyDeleteBlog लिखना जारी रखें, शुभकामनाएं 👌👌
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है। आजोबा के अनुशासन और प्रबल इच्छाशक्ति को प्रणाम। अंदर से जितने अनुशासित और दृढ़ थे, बाहर से उतने शांत और सरल। वे हम सब के लिए प्रेरणा है। 🙏🙏🙏
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