रिम~झिम गिरे सावन
मै १९६०, १९७० और कुछ हद तक १९८०-९० के हिंदी फिल्मी गानों का कई वर्षों से बड़ा प्रशंसक रहा हूँ। अभी भी रोज़ सुबह~शाम, काम पर जाते और वापस आते हुए, मैं इन्हीं दशकों के गानों को सुनते हुए, मुंबई की कठिन यातायात परिस्थितियों को अपनें लिए सुगम बनाने प्रयास करता हूँ।
हाल के कुछ महीनों में, मेरे साथ सफर करने वाले, मिलेनियल (आज की नयी पीढ़ी के) सहकर्मियों में हिंदी फ़िल्मी संगीत के इस स्वर्णिम काल की जानकारी का आभाव, कवी के लिखे अप्रतिम शब्दों को समझने में होने वाली उनकी उलझन और उन्हें इस काल के गीतों को समझानें के मेरे प्रयासों का परिणाम है की आज मैं ये लेख लिखने की लिए प्रेरित हुआ हूँ ।
इस लेख को समीक्षा कहना उचित नहीं होगा, क्यूँ की, यह तो एक प्रशंसक के द्वारा की गयी विवेचना है, जो पिछले कई दिनों से इस गीत के बोल, संगीत, कलाकारों के अभिनय, दिग्दर्शक के अप्रतीम कार्य और गीत की सरलता से प्रभावित होकर लिखी गयी है।
रिम~झिम गिरे सावन, वर्ष १९७९ में श्री बासु चटर्जी द्वारा दिग्दर्शित फिल्म मंज़िल का वह गीत, जिसमें बासु दा की फिल्मों की सरलता, उनके द्वारा कलाकारों से करवाया जाने वाला सहज अभिनय, उनकी फिल्मों में मिलने वाला श्री राहुलदेव बर्मन का सुमधुर संगीत और बासु दा के एक और साथी, गीतकार श्री योगेश के अप्रतीम शब्द, किशोर कुमार और लता मंगेशकर के स्वर इन सभी का मिश्रण देखने और सुनने को मिलता है।
मेरे विचार से, यह गीत उन चुनिंदा गीतों में सम्मिलित है, जिन्हें सुनकर फिल्म की कहानी जानने की उत्सुकता अनायास ही बढ़ जाती है।
मेरे विचार से, यह गीत उन चुनिंदा गीतों में सम्मिलित है, जिन्हें सुनकर फिल्म की कहानी जानने की उत्सुकता अनायास ही बढ़ जाती है।
यह गाना, फिल्म मैं दो बार, मुख्य कलाकार अमिताभ बच्चन और मौशमी चटर्जी के ऊपर चित्रित किया गया है। पहला गाना नायक के मन के विचारों और गाने को सुनती, मंत्रमुग्ध नायिका के मन में नायक के प्रति उठ रहे प्रेम को प्रभावी रूप से प्रदर्शित करता है।
गायक कशोर कुमार नें इस ठहराव के साथ इस गीत को गया है, संगीतकार बर्मन डा नें जिस प्रकार से गाने को स्वर बध्ध किया है और गीतकार ने जैसे शब्द लिखे हैं, ऐसा लगता है जैसे दिग्दर्शक के दृष्टिकोण के साथ इससे बेहतर न्याय नहीं हो सकता था।
गायक कशोर कुमार नें इस ठहराव के साथ इस गीत को गया है, संगीतकार बर्मन डा नें जिस प्रकार से गाने को स्वर बध्ध किया है और गीतकार ने जैसे शब्द लिखे हैं, ऐसा लगता है जैसे दिग्दर्शक के दृष्टिकोण के साथ इससे बेहतर न्याय नहीं हो सकता था।
गीतकार योगेश ने शब्दों का ऐसा जादू बुना है कि नायक और नायिका के बीच प्रत्यक्ष संवाद न होते हुए भी, दर्शक/श्रोता को दोनों के विचारों की सौंधी खुशबु का अहसास होने लगता है।
रिमझिम गिरे सावन, सुलग सुलग जाये मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाये मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिमझिम गिरे सावन...जब घूंगरूओं सी बजती हैं बूंदे
अरमा हमारे पलकें ना मूंदे
कैसे देखे सपने नयन, सुलग सुलग जाये मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिमझिम गिरे सावन...महफ़िल में कैसे कह दे किसी से
दिल बंध रहा हैं, किसी अजनबीसेे
महफ़िल में कैसे कह दे किसी से
दिल बंध रहा हैं, किसी अजनबी से
हाय करे अब क्या जतन, सुलग सुलग जाये मनभीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाये मन
भीगे आज इस मौसम में, लगी कैसी ये अगन
परदे के पीछे के कलाकरों ने जितना प्रभावित किया है, उतना ही परदे के आगे कलाकारों ने अपने सहज अभिनय से दिग्दर्शक की कल्पना को साकार किया है। एक ही जगह पर बैठे, बिना एक दूसरे की और देखे, मात्र अपने हाव~भावों के सहारे और शब्दों को अभिनीत करके भी सब कुछ कहा, समझा जा सकता है यह अभिनय कला आज के समय में विलुप्त हो चली (चुकी) है। प्रेम की पराकाष्ठा को बिना प्रत्यक्ष शब्दों के, बिना स्पर्श किये इतने प्रभावी रूप से चित्रित करना, कलाकारों की क्षमता का उदाहरण है।
जहाँ पहला गाना, नायक के मन की बातों को ठहराव के साथ सामने रखता है, वहीं दूसरा गाना प्रेम में सराबोर नायिका के मन में उठ रहे सवालों के बारे में है।
रिमझिम गिरे सावन सुलग-सुलग जाए मन भीगे आज इस मौसम में लगी कैसी ये अगन रिमझिम गिरे सावन...
पहले भी यूँ तो बरसे थे बादल, पहले भी यूँ तो भीगा था आँचल अब के बरस क्यूँ सजन, सुलग-सुलग जाए मनभीगे आज इस मौसम में... इस बार सावन दहका हुआ है, इस बार मौसम बहका हुआ हैजाने पी के चली क्या पवन, सुलग-सुलग जाए मन भीगे आज इस मौसम में...
गीत का जादू कुछ इस तरह है की शब्दों में जहाँ नायिका के मन में उठ रहे प्रश्न हैं वहीं संगीत, चित्रीकरण और अभिनय उन्हीं प्रश्नों के उत्तर देते प्रतीत होतें हैं।
एक बार पुनः, नायक ~ नायिका शब्दों से उठ रहे प्रश्नो के उत्तर अपने अभिनय से देते हैं। नायक के साथ, सावन की फुहारों में, निश्चिन्त और दिशाहीन होकर घूमते हुए, नायिका अपनें मन में उठ रहे सवालों के जवाब ढूँढ रही है। उसके चेहरे के हाव~भाव, उसके प्रेम में सराबोर विचारों को सहजता से चित्रित करते हैं।
आज के समय में सभी कलाकारों (अभिनेता/नेत्री, गीतकार, संगीतकार, गायक/गायिका) का, इस तरह सहजता के साथ, दिग्दर्शक की परिकल्पना को साकार करना असंभव सा लगता है. शायद यही कारण है की १९६०~७० को हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम काल कहा जाता है। हिंदी सिनेमा उस समय के कलाकारों का सदा ऋणी रहेगा.
दोनों गानों की लिंक यहाँ दे रहा हूँ , आशा है गानों को उपरोक्त सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर सुनेंगे तो आपका आनंद द्विगुणित हो जायेगा।
अमोल
Very well written!
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