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Beemanagar Tales-3

आज सुबह, चाय पीते हुए, जब कोयल की मधुर आवाज सुनी, तो बचपन की कुछ यादें ताज़ा हो गईं। 

ऐसा नहीं है की मुंबई में कोयल की आवाज सुनने को नहीं मिलती और इस कठिन परिस्थिति में जब सब और शांति फैली हुई हे तभी कोयल की आवाज सुनने में आ रही है। पर यह भी सच है, की पश्चिमी द्रुतगति मार्ग के पास सोलहवीं मंज़िल पर रहते हुए,  वाहनों की तेज आवाजों के बीच, पक्षियों की मधुर ध्वनि पर कम ही ध्यान जाता है।

खैर, बात १९८०-९० के दशक में उन दिनो की है जब परीक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं, और बीमानगर में हम सब की गर्मी की छुट्टियां शुरू हो चुकी थी।  

सुबह-सुबह पक्षियों के चहकने के बिच, मेरी आवाज गुंजी।। क्षितिज, क्षितिज, क्षितिज। सामने के घर से, पहली मंज़िल पर, आखरी खिड़की से आंखें मलता क्षितिज आया। "अबे साले इतनी जल्दी जाएंगे क्रिकेट खेलने ? अभी तो साढ़े छै ही बजा है।" जवाब आया "अभी उठाया है तब तू  सात तक मैदान पर आएगा".

हमारे दल में तब मैं, क्षितिज, सुदीप, आनंद, अमित, बब्बू, दुष्यंत, हर्षल, गुलजीत और हाँ मधुरा भी हुआ करती थी। मधुरा, दुष्यंत-हर्षल की मौसेरी और बब्बू की ममेरी (या ऐसा ही कुछ) बहन थी जो गर्मी की छुट्टियों में महू से इंदौर आ जाया करती थी।  वैसे मधुरा क्रिकेट को छोड़कर बाकि सारे खेलों में हमारे साथ हुआ करती थी।  

उन दिनों गर्मी की छुट्टियों का सुबह से लेकर शाम तक की समयसारणी (Timetable) तय रहती थी। 

१. सुबह उठ कर टहलने जाना 
२. घर आकर दूध पीकर क्रिकेट खेलने जाना 
३. वापस आकर नहा धो कर, असीम की लायब्रेरी में कॉमिक्स बदलवाने जाना 
४. घर आकर खाना खाने के बाद किसी एक दोस्त के घर पर लाल पान सत्ती, व्यापार, लूडो या फिर ऐसा ही कोई घर बैठे वाला खेल खेलना। या फिर कम्युनिटी हॉल के बरामदे में कुत्ते के पिल्लों ( जिनके नाम जॉन, जॉनी , जनार्दन और पादुराम थे) से खेलना।
५. शाम ४ बजे तक घर वापस आकर शाम का नाश्ता करके या तो फिर क्रिकेट खेलने जाना या फिर सायकल चलने जाना 
६. महीने में एक बार १०-१० रुपए लेकर 'मधुशाला' में गन्ने का रस पिने जाना 

मधुशाला, गर्मी के मौसम में शासन द्वारा आवंटित जमीनों पर, सिर्फ गर्मी के महीने में गन्ने के रस की बिक्री के लिए लगाई गयी वो दुकानें होती थी, जिन्हे बांस और सफेद कैनवास की मदद से बनाया जाता था।  कैनवास पर सुंदर पेंटिंग की जाती थी और बैठने के लिए सरकंडे और टायर से बने मुड़े रखे जाते थे।    

शाम के समय जब मधुशाला की मिट्टी पर पानी छिड़कने की वजह से जो सौंधी खुशबु आती थी, गन्ने के रस की मिठास द्विगुणित हो जाया करती थी।  २/- रुपए में बिना बर्फ और २.५/- रुपए में बर्फ के साथ, गन्ने का रस। जिसका जितना मन हो पिता था।  १०-१० रुपए जो पास थे। हाँ पर महीने में एक बार ही यह सौभाग्य मिलता था।  आज के बच्चों की तरह हमें जेब खर्च जिसे Pocket Money कहते हैं, वह नहीं मिला करती थी। 

उन दिनों सायकल चलाने के लिए भी हम दूर-दूर निकल जाया करते थे। आज कल की तरह माता-पिता को बच्चों को दूर भेजने में डर की भावना नहीं होती थी।  सुरक्षितता का एक आभास जो उन दिनों हुआ करता था, वो आज नदारत है।   

खैर, उन दिनों इंदौर में आगरा बॉम्बे रोड को शहर के बाहर से निकालने के लिए बायपास रोड का काम चल रहा था। चूँकि काम कुछ समय पूर्व ही शुरू हुआ था तो कुछ हिस्से ही बन पाए थे। उस समय में सीमेंट की सपाट सड़कें हमने कभी देखि नहीं थी और उन सपाट हिस्सों (जितने बन चुके थे) पर तेजी से साइकिल चलाने का मजा ही कुछ और था। 

बायपास पर साइकिल चलाते हुए हमें देवगुराड़िया की पहाड़ी नजर आति थी। और पता नहीं कब एक दिन देव गुराड़िया पर पिकनिक के लिए जाने की योजना बन गयी। सभी मित्रों ने साथ बैठ कर  तय किया की कौन खाने में क्या लेकर आएगा, सुबह कितने बजे मिलना है, किस रास्ते से जाना है। साथ ही यह भी तय हुआ की जिसके घर में मना किया जायेगा वहां मानाने के लिए सभी को एक साथ जाना है।      

शाम होते~होते सुनने में आया की दुष्यंत, हर्षल, बब्बू के साथ कुछ परेशानी है। सभी सुदीप के घर पर जमा होंगे, यह तय हुआ। कुछ समय बाद जब सब सुदीप के यहाँ मिले, तो पता चला की मधुरा हम सभी से नाराज है। हम सभी ने देवगुराड़िया जाने की तैयारी में मधुरा से पूछने की जरूरत भी नहीं समझी की क्या वह हमारे साथ चलना चाहती है। सुदीप के घर पहुंच कर बहुत मान~मनुहार और माफ़ी मांगने के बाद मधुरा ने अपना गुस्सा छोड़ा और बात तय रही की वह भी हमारे साथ देवगुराड़िया आएगी ।  अगले दिन सुबह ७ बजे मिलना तय हुआ। 

सभी अपनी सायकल लेकर अगले दिन सुबह मिले। करीब १०-१२ किलोमीटर सायकल चलने के बाद हम लो गेवगुरादिया की पहाड़ी की तलहटी में एक खेत के पास पहुंचे। सोचा सभी भोजन करके कुछ देर सुस्ता कर पहाड़ी चढ़ेंगे।

सबके घर से आये  डब्बों से महकता हुआ स्वादिष्ट खाना निकला गया।  अगर मुझे कुछ कुछ याद है तो बब्बू की डब्बे में शीरा, अमित के डब्बे में मसाले भात, क्षितिज के पराँठे , गुलजीत में सैंडविच , दुष्यंत, हर्षल के पूरी भाजी और जाने क्या क्या।  

कुछ तस्वीरें भी ली जो इतने सालों बाद आज भी उन मीठी यादों को सहेजे हुए है और उन्हें देखते ही चेहरे पर एक मुस्कान आ जाती है।


सबने जी भर कर खाना खाया।  अपने डब्बे और थालियां वहीँ एक ट्यूबवेल पर धोई।  वैसे और भी कुछ चीजें हुई, जो मेरे मित्रों को याद होंगी। और याद करके उन्हें हंसी भी आएगी। पर हर्षल के बारे में सोचकर मैं यहाँ उस बात का उल्लेख नहीं करूँगा। 

दोपहर होते~होते हम सभी ने पहाड़ी साधना शुरू कर दिया।  उम्र के लिहाज से कहूं तो आजकल के माता पिता इस उम्र मैं अपने बच्चों को देवगुराड़िया जाने के बारे में सोच भी नहीं सकते।

कठिन मेहनत करने के बाद हम लोग शायद २ बजे के करीब पहाड़ी के ऊपर पहुँच गए।  इतनी मेहनत के बाद ऊपर से दूर दूर तक के नज़ारे देखने का आनंद कुछ और ही होता है। 




ये दोनों तस्वीरें सुदीप ने ली हैं। आज वो हम लोगों के बिच नहीं है और यह बात रह रह कर मुझे चुभती हैं।  हम सभी के बचपन  की वे यादें मन में सहेजकर  रखी हैं।  आज भी जब आपस मैं बात करते हुए उन दिनों को याद करते हैं तो लगता है ख्वामखाह ही बड़े हो गए।  हम तो बच्चे ही अच्छे थे।   

Comments

  1. बहुत बढ़िया अमोल , बचपन के वो दिन याद आ गए

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  2. सुंदर , अति सुंदर 😀

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